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असली आनन्द बरसात में

हम पहाड़ियों को वर्ष भर कभी किसी मौसम में कोई परेशानी नहीं होती पहाडों में ,ऐसे जीते हैं जैसे स्वर्ग में जी रहे हों….…... मगर  बरसात का मौसम शुरू होते ही कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है..........   मसलन जगह- जगह  सड़कें अवरुद्ध हो  जाती हैं, रास्ते टूट जाते हैं..., पेड़ गिर जाते हैं,.. पैदल रास्ते कीचड़ से फिसलन भरे हो जाते हैं, जोंकों का सामना करना पड़ता है…...........बिजली गिरने का खतरा होता है.......बादल फटने का डर होता है.......आदि आदि…...

   लेकिन इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं कि बरसात में यहाँ जीवन जिया ही नहीं जा सकता .....परेशानियाँ और समस्याएं जरूर हैं...मगर वह जीवन ही क्या जिसमें परेशानियाँ ही न हों। इन समस्याओं से तो हमें हर वर्ष जूझना पड़ता है,    बस थोड़ा सा जोख़िम तो लेना ही पड़ता है..........

और यदि  हममें से कोई ये कहे कि उसने बिना कोई जोख़िम लिए   घुमक्कड़ी की है तो माफ़ कीजिए ,आप बिल्कुल सफेद झूठ बोल रहे हैं।  बिना जोखिम के क्या
घुमक्कड़ी सम्भव है????
यदि सम्भव है तो वह फिर घुमक्कड़ी नहीं हो सकती........
मैं हमेशा बरसात को सकारात्मक रूप में लेता हूँ,      
                 बी पॉजिटिव........
बरसात को ऐडवेंचर से जोड़कर यदि देखा जाय तो तो सब कुछ सामान्य और आसान लगने लगता है.....
       मुझे भी हर रोज  अपने विद्यालय 3 किमी पैदल चलकर  घनघोर जंगल से होकर जाना होता है.......जून की लंबी छुट्टियों के बाद रास्ते में 25-30 जोंक अच्छा खासा स्वागत करती हैं...   ऊपर से चीड़ के गिरते पेड़ों के बीच से बच कर निकलना किसी सुपर-मैन के अहसास से कम नहीं लगता.......... खैर छोड़िए ,  ये तो मेरा रोज का काम है............
    यह सब मैंने इसलिए लिखा कि 
कई मित्रों के मन में इस मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों की ओर रुख करने का निर्णय लेने पर संशय होता है, मगर मेरा मानना ये है कि यदि आप सच्चे घुमक्कड़ हैं....... और बरसात को ऐडवेंचर के रूप में लेंगे.. तो आप बेझिझक पहाड़ों का रुख़ कर सकते हैं, कुछ अतिरिक्त सतर्कता एवं सावधानियों के साथ...............
     
और चलते -चलते यह भी बता दूँ(बहुत से साथियों को पता भी होगा….) कि हमारे पहाड़ों में बहुत सारे स्थानीय मेले, धार्मिक आयोजन, बरसात के मौसम में ही आयोजित होते हैं..............
// केदारनाथ में हर वर्ष प्रसिद्ध 'भतूज मेला' रक्षाबन्धन के दिन लगता है....
// राँसी स्थित (उखीमठ क्षेत्र) राकेश्वरी मन्दिर से शुरू होती है प्रसिद्ध मंनणी माई जात--हर वर्ष श्रावण के महीने 35 किमी दूर मनणा बुग्याल तक जाती है डोली।
// देवरिया ताल में कृष्ण जन्माष्टमी को लगता है भव्य मेला।
// दयारा बुग्याल में खेली जाती है 15 अगस्त के आसपास भाद्रपद संक्रान्ति को  मक्खन और मट्ठे की होली(बटर फेस्टिवल)।
//त्रियुगीनारायण मन्दिर में प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह में बावन द्वादशी को लगता है मेला....
// बेदनी बुग्याल में आयोजित होता है तीन दिवसीय रूपकुण्ड पर्यटन महोत्सव।
बेदनी में आयोजित होने वाला रूपकुंड महोत्सव  धार्मिक आस्था से जुड़ा है, जो माँ नंदा देवी राजजात यात्रा का एक मुख्य पड़ाव भी है। हर साल यहां माँ राजराजेश्वरी की लोकजात यात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है।
*तो सोचिए मत बरसात में भी आनन्द लीजिए हमारे पहाड़ों का*
      धन्यवाद

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