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हरियाली काँठा यात्रा

***05 नवम्बर 2018***
💐धन तेरस के दिन💐

              प्रसिद्ध सिद्धपीठ माँ हरियाली देवी की हरियाली कांठा यात्रा अपने आप में एक अनोखी व अदभुत यात्रा है। हमें भी इस बार माँ हरियाली का बुलावा आया तो हम भी पहुँच गये धनतेरस की शाम 5:30 बजे उत्तराखण्ड राज्य के जसोली (रुद्रप्रयाग जिला) स्थित हरियाली देवी मंदिर में ..........
     हमारी योजना यह पैदल यात्रा करने की कैसे बनी, जरा इस बारे में भी बता दूं। दरअसल हुआ यूँ था कि हम लोग जब इसी साल 31 मई को बैनीताल जा रहे थे तो उससे पहले हम हरियाली देवी मन्दिर में गए थे। और मन्दिर के पुजारी चमोली जी से हरियाली कांठा वाली यात्रा करने का वादा कर गए। चमोली जी से हमने इस यात्रा की थोड़ा बहुत जानकारी भी जुटा ली थी।
उस दिन (31मई 2018) को मैं,धीरू भाई व मोहन भण्डारी जी बड़े ही शुभ अवसर पर यहाँ पहुंचे थे, जब मन्दिर परिसर में 100 फ़ीट ऊँचे  लोहे के खम्बे  को मशीन के द्वारा खड़ा किया जा रहा था, खम्बे के ऊपरी सिरे पर एक झण्डा लगाया गया था।
      यह माता का आशीर्वाद ही था जो हमें भी इस खम्भे को खड़ा करने का सौभाग्य मिला था और हम तीनों ने भी मशीन को पम्प किया था।
 और यह सब किया जा रहा था माता के परम भक्त  चंडीगढ़ निवासी अजय अरोड़ा जी द्वारा। अरोड़ा जी ने उस दिन बताया था कि उनके द्वारा 8 किमी ऊपर हरियाली कांठा में भी इसी प्रकार का झण्डा खड़ा किया जाएगा।  धन्य हैं अरोड़ा जी।
 माँ हरियाली की कृपा हमेशा उन पर बनी रहे।
मन्दिर के पुजारी चमोली जी भी बड़े ही सज्जन व्यक्ति थे। और हमारे ही बैच की थपलियाल मैडम (जो प्राथमिक विद्यालय जसोली नवीन में कार्यरत हैं )की बड़ी तारीफ कर रहे थे। बड़ा अच्छा लगा उनकी तारीफ सुनकर। और हाँ मंदिर जाने से पहले उस दिन हमने गौरव मैठाणी की दुकान से प्रसाद भी लिया था।
 
अब  फिर से आपको लिए चलते हैं  05 नवम्बर वाली हरियाली कांठा पैदल यात्रा पर।
 
यह यात्रा अनोखी व अनूठी इसलिए है कि इस यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों को कड़े नियमों  का पालन करना पड़ता है।
रुद्रप्रयाग जिले के जसोली गाँव में हरियाली देवी का पौराणिक  मंदिर शंकराचार्य के समय से निर्मित होना बताया जाता है। 
इस यात्रा को करने से पूर्व एक माह तक  भक्तों को मांस-मदिरा, प्याज, लहसुन का पूरी तरह त्याग करना पड़ता है और पूरी 8 किमी. की यात्रा नंगे पाँव ही करनी पड़ती है।
महिलाओं का इस यात्रा में जाने पर पूर्णतः प्रतिबन्ध है, इसीलिए हमें कोई भी महिला इस रातभर चलने वाली यात्रा में नहीं दिखी।

यह यात्रा हर वर्ष जसोली स्थित हरियाली देवी के मुख्य मंदिर से  धनतेरस की शाम को गोधूलि बेला पर शुरू होती है,और रात भर घनघोर जंगल के बीच  होते हुए अगले दिन सुबह  8 किमी दूर  माता के मायके हरियाली कांठा  पहुँचती है।
          जसोली स्थित हरियाली देवी मन्दिर की समुद्रतल से ऊँचाई 1580 मीटर है, जबकि  हरियाली कांठा की समुद्रतल से ऊँचाई 2866 मीटर है।

हम तीन लोग  मैं ,धीरू भाई और मोहन भण्डारी(प्रधानजी) ने इस बार यह यात्रा करने की ठानी थी,और एक माह पूर्व से ही यात्रा के लिए सभी नियमों का पालन करना शुरू कर दिया था।
प्याज,लहसुन,मांस-मदिरा सब कुछ बन्द हो गया था। हमें इस नियम के बारे में जानकारी तो थी,लेकिन कितने समय पूर्व से इस नियम का पालन करना आवश्यक है? इस मामले में बड़ा कन्फ्यूज़न था।कोई कह रहा था एक महीने पहले और कोई कह रहा था एक हफ्ते पहले.....
 लेकिन हम इस बार हर हाल में इस यात्रा को करना चाहते थे, सो हमने एक माह पूर्व से ही तामसी भोजन का त्याग कर दिया था। हालांकि जसोली पहुँचकर पक्का हो गया कि कम से कम एक सप्ताह  तो त्याग करना ही पड़ता है।

शाम को ठीक 6:30 बजे हरियाली देवी मन्दिर परिसर से माँ की डोली  सैकड़ों भक्तों के जयकारों के साथ हरियाली कांठा के लिए रवाना हुई। ठीक 7 बजे माँ हरियाली की डोली कोदिमा नामक गाँव पहुँची,जो मन्दिर यानि जसोली गाँव से  लगभग डेढ़ किमी पैदल है।
वैसे कोदिमा गाँव तक पक्की सड़क बनी हुई है। यहाँ तक गाड़ी से आकर भी कुछ लोग यात्रा में शामिल होते हैं।  जसोली से कोदिमा की सड़क मार्ग से दूरी  5 किमी है, लेकिन डोली पारम्परिक पैदल रास्ते से होकर ही जाती है।
कोदिमा इस यात्रा में पड़ने वाला अंतिम गाँव है। इससे आगे यात्रा घने बाँज,बुराँस के जंगल से होकर गुजरती हैं। हम लोग कोदिमा गाँव थोड़ा जल्दी पहुँच गये थे क्योंकि हमें श्रीमान त्रिलोक सिंह बिष्ट जो कि कोदिमा के ही निवासी हैं,से मिलना था।
ये हमारे साथी धीरू भाई के रिश्तेदार हैं और धीरू भाई ने हमारे आने की सूचना इनको पहले ही फोन करके दे दी थी।
 बिष्ट जी ने हमारे लिए अपने घर पर ही खाने का प्रबन्ध कर रखा था। बड़े ही सज्जन व्यक्ति हैं त्रिलोक सिंह जी।
बड़ा ही सत्कार किया उन्होंने हमारा अपने घर पर.... बड़ा ही आनन्द आया..... सच में....
त्रिलोक सिंह जी गाँव में अपनी धर्मपत्नी  जी के साथ रहते हैं। दो बेटे दिल्ली में नौकरी करते हैं।
   कोदिमा गाँव पहुँच कर डोली भक्तों को आशीर्वाद देती है और फिर अपने मायके हरियाली कांठा के लिए प्रस्थान करती है।
        सैकड़ों भक्त नंगे पाँव ही इस यात्रा को कर रहे थे। बड़े ही जोश और उत्साह के साथ माँ हरियाली के जयकारे लग रहे थे।  बोलो...  माँ हरियाली देवी की........जय ।
माँ शेरा वाली की...... जय।
एक दो तीन चार.... हरियाली माँ की जयजयकार।
हम लोग भी  त्रिलोक सिंह जी के साथ बाँसों की और चल दिये।
           बाँसों इस यात्रा का अगला पड़ाव है, जो कि कोदिमा गाँव से लगभग ढाई किमी है। यहाँ पर हम लोग रात 9 बजे पहुँचे। डोली यहाँ पर 2-3 घण्टे विश्राम करती हैं। भक्त यहाँ पर आग जला कर ठण्ड को दूर भगाने का प्रयास करते हैं। खुले आसमान के नीचे भक्त लोग  भजन-कीर्तन करते हुए समय व्यतीत करते हैं।
 बाँसों में थोड़ा सी समतल जगह है, भक्तों को थोड़ा  विश्राम करने हेतु जगह मिल जाती है। हमारे पास स्लीपिंग बैग थे सो हम भी स्लीपिंग खोलकर इसके  अंदर  घुस गए। नींद तो नहीं आयी लेकिन ठण्ड से निजात मिल गयी।
वैसे हम घर से टेंट ,मैट्रेस भी लेकर आये थे, जो हमने गाड़ी में ही छोड़ दिये थे, क्योंकि हमें टेंट लगाने का समय ही नहीं मिल पाता और टेंट लगाने के लिए रास्ते में उतनी पर्याप्त जगह भी नहीं थी।
लगभग 1 बजे हम बाँसों से आगे  चल पड़े। अब पाँवो में ठण्ड ज्यादा लग रही थी। पाला पड़ने से रास्ता भी गीला हो गया था।
 मैं आज पहली बार किसी यात्रा को नंगे पाँव कर रहा था।
बाँसों के बाद कुछ ज्यादा ही खड़ी चढ़ाई है।
रात 2 बजे हम पंचरँग्या नामक स्थान पर पहुँच गये।  पंचरँग्या बाँसों से डेढ़ किमी दूर है और कोदिमा गाँव  के बाद एक मात्र पानी का श्रोत यहाँ पर ही है।
 दाईं तरफ जाकर 50 मीटर पर एक छोटा सा पानी का धारा(सोता) है। कोई भक्त यहाँ से अभी अभी नहाकर निकला है, क्योंकि वह अपना अंडरवियर धो कर यहीं पर भूल गया है। या फिर यह भी हो सकता है कि उसने जानबूझकर छोड़ा हो, कल इसे वापसी में ले जाने के लिए।
इतनी रात को इस ठंडे पानी में नहाने वाले उस शख्स को सलाम है।
 कोदिमा गाँव से ही हम लोग चार लीटर पानी अपने साथ लेकर चले थे। कोदिमा और पंचरँग्या  के बीच कहीं भी पानी नहीं है, और पंचरँग्या  के बाद भी कहीं पानी नहीं है। सो यहीं  पंचरँग्या के धारे(सोता) से ही पानी  लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
   यहाँ से पानी भरने के बाद जैसे-जैसे  हम आगे बढ़ते जा रहे थे, वैसे-वैसे सहन शक्ति भी बढ़ती जा रही थी। शायद ये माँ हरियाली की कृपा ही थी कि हम इतनी ठण्ड में भी बड़े आराम से नंगे पाँव चलते जा रहे थे।
  हमारे साथी त्रिलोक सिंह जी अपने साथ चाय का थर्मस(फ्लास्क )लेकर आये थे। इसमें से बाँसों में  भी हमने चाय पी थी।
  अब ठण्ड और ज्यादा लगने लगी थी सो रास्ते में फिर चाय पीनी पड़ी। इस समय चाय बड़ा ही टॉनिक का काम कर रही थी।
 चाय बिस्किट खाने के बाद हम लोग आगे बढ़ते गये।
चढ़ाई भी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी।
रात 3 बजे हम लोग मल्या कनफेला नामक पड़ाव  पहुँच गये। यह स्थान पंचरँग्या से डेढ़ किमी और मुख्य मंदिर( जसोली) गाँव से 7 किमी की दूरी पर है।
अब यहाँ से हरियाली कांठा की दूरी मात्र एक किमी है, सो अब सुबह 6 बजे तक यहीँ पर रात गुजारनी पड़ेगी।
      कुछ लोग यहाँ हमसे पहले पहुँच कर आग के चारों और बैठे रात गुजार रहे थे।डोली भी अभी नहीं पहुँची थी। हमने भी स्लीपिंग बैग खोल दिये। धीरू भाई और प्रधान जी को तो जगह मिल गयी और वे तुरन्त अन्दर घुस गए,मुझे स्लीपिंग बैग बिछाने की जगह ही नहीं मिल पा रही थी। सामने जहाँ लोग आग सेक रहे थे वहाँ पर थोड़ी जगह थी मगर उनके पास स्लीपिंग बैग, कम्बल आदि कुछ नहीं था, आग की उन्हें सख्त जरूरत थी इसलिए उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं था।
मुझे 10 मिनट तक जगह खोजने के बाद भी जब जगह नहीं मिली तो मजबूर हो कर पाले से हुई गीली जमीन के ऊपर ही स्लीपिंग बैग बिछा दिया और इसके अंदर घुस गया।
 जहाँ बाँसों में हमें बिल्कुल भी नींद नहीं आयी थी यहाँ पर जल्दी ही नीँद आ गयी। जबकि यहाँ पर एक तरफ़ गहरी खाई थी और दूसरी तरफ (जहाँ से हम ऊपर चढ़ कर आये थे) बिल्कुल ढलान था। जरा भी दाँये बाँये खिसके तो कहानी खत्म होनी तय थी। 
लेकिन माँ हरियाली की कृपा ही थी कि आराम से सोये रहे 5 बजे तक। अब डोली भी पहुँच चुकी थी ।अब सुबह 6 बजे सभी भक्त यहाँ से  डोली के साथ ही चलेंगे।
कुछ ही देर में उजाला होने लगा। चौखम्भा की चोटी सफेद चादर ओढ़े नज़र आने लगी, बड़ा ही मनोहारी दृश्य था आज की इस सुबह का। सुबह 6 बजे हमलोग माँ हरियाली की डोली के साथ साथ चलने लगे। सवा छः बजे हम माँ के मायके  हरियाली कांठा पहुँच गये। 
   यहाँ पर माँ हरियाली का एक  भव्य मन्दिर है। एक धर्मशाला भी है। लगभग दो सौ लोग हमसे पहले यहाँ पहुँच चुके थे। शायद वे रात को ही यहाँ पहुँच गये होंगे।
अब सूर्य नारायण का इन्तजार हो रहा था।  ठीक साढ़े छः बजे सूर्योदय हो गया। चौखम्भा की बर्फीली चोटी पर सूर्योदय का  नजारा बहुत ही सुंदर लग रहा था। डोली मन्दिर की परिक्रमा करने के बाद मन्दिर की छत पर रख दी गयी थी।
 मन्दिर के अन्दर पूजा शुरु हो गयी। कुछ ही देर में माँ का भोग भी तैयार हो गया।माँ हरियाली को चढ़ावा देने के लिए अन्दर जाने के लिए भक्तों की लाइन लग गयी। हम भी लाइन में लग गए। काफी देर बाद नम्बर आने के बाद माँ को चढ़ावा चढ़ा कर हम धन्य हो गए।  
   लगभग 9 बजे हम यहाँ से वापस चल दिये। वापसी में बाँसों में हमने चने खाये,जो कल धीरू भाई  घर से लेकर आये थे।
 साढ़े दस बजे हम कोदिमा पहुँच गये। यहाँ पर भक्तों के लिए भंडारा लगा था। हमने त्रिलोक सिंह जी के यहाँ नास्ता किया। 
    त्रिलोक सिंह जी बड़े ही सज्जन व सेवा भाव वाले व्यक्ति हैं। बड़ा प्रभावित किया उन्होंने हमें। माँ हरियाली की कृपा उन पर हमेशा बनी रहे।
नास्ता करने के बाद दोपहर 12 बजे हम घर के लिए निकल पड़े।
                     #जय माँ हरियाली# 
 
हरियाली देवी मन्दिर जाने  के लिए  उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से 18 किमी दूर बद्रीनाथ राष्ट्रीय राज मार्ग पर स्थित नगरासू बाज़ार से दायीं ओर सड़क  कट जाती है। यहाँ से 22 किमी दूर जसोली गाँव में  मन्दिर स्थित है।

यहाँ से हरियाली कांठा 8 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद  पहुँचा जा सकता है।
हरियाली कांठा मंदिर में भक्तों की भीड़

हरियाली काँठा  मन्दिर और मैं



मन्दिर के बाहर माता की डोली के साथ मोहन भाई, धीरू भाई और जोंटी (यही डोली हरियाली कांठा जाएगी)

हरियाली देवी मन्दिर में(जसोली) पण्डित जी के साथ (साथ में धीरू भाई)
हरियाली देवी मन्दिर का गेट (सड़क के किनारे)

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