"आज डुंडा से डोडीताल "
हर दिन की तरह ठीक सुबह 5:30 बजे मेरे मोबाइल में अलार्म बज गया,नींद खुल गई, धीरू भाई को भी जगा दिया,पर जैसे ही मैं फ्रैश होने गया धीरू भाई फिर सो गए।हाथ-मुँह धो कर आया तो फिर से धीरू भाई को जगाना पड़ा।तैयार होते-होते 6:30 बज गए।
डुंडा से सुबह 6:30 बजे किसी को बिना बताए मैं और धीरू भाई चल दिए...........आज हमें डोडीताल पहुँचना था ......वैसे हमारा डोडीताल दो दिन में पहुंचने का कार्यक्रम था मगर सेममुखेम भी जाना था वापसी में.......सो सब कुछ जल्दी जल्दी करना था......नैथानी जी ने कल ही आने से मना कर दिया था .....सो सुबह किसी को तंग किये बिना ही चल दिये।
डुंडा से डोडीताल जाने के लिए पहले उत्तरकाशी जाना पड़ता है........डुंडा से उत्तरकाशी की दूरी है 16 किमी.।
उत्तरकाशी से ठीक पहले एक 400 मीटर लम्बी सुरंग है....वरुणावत पर्वत के ठीक नीचे............. आधे घण्टे में उत्तरकाशी पहुंच गए 7 बजे...........
अब हमें गंगोरी जाना था........गंगोरी उत्तरकाशी से 5 किमी दूर गंगोत्री मार्ग पर है यहीं से संगमचट्टी के लिए बांयी ओर सड़क कट जाती है...... अस्सी गंगा को पार करने के बाद गंगोरी तिराहे वाले बोर्ड पर लिखा था संगमचट्टी 10 किमी.। ........अब हम संगमचट्टी वाली सड़क पर चल रहे थे .....एक किमी आगे एक दुकान में चाय पी ली., और जरूरी चीजें खरीदी।..........5 किमी तक सड़क अच्छी है...पर उसके बाद बिल्कुल खराब ....नीति-गमसाली वाली सड़क की याद आ गयी......कार के स्पीडोमीटर की सुई जीरो से भी कम दिखा रही थी।.....ऐसे में पैदल वाला भी हमसे आगे जा सकता था ... मैं संभल कर कार चला रहा था ,पत्थरों और गड्ढों से बचा कर चला रहा था..... फिर भी जिसका डर था वो हो ही गया, अचानक से कार के नीचे पत्थर लगने की आवाज आई..... ये क्या गियर काम नहीं कर रहे..... डोडीताल यात्रा पर पानी फिरता नजर आने लगा.....थोड़ा जोर लगाया तो फर्स्ट गियर लग गया........अब सारा कुछ रिवर्स गियर पर निर्भर था....चलो कोशिश करते हैं... थोड़ा अड़ने के बाद गियर लग गया......... यानी काम चल सकता था ... थैंक्स गॉड ..... कुछ तो ऑप्शन छोड़ा हमारे लिए, बी पॉजिटिव। अगर रिवर्स गियर नहीं लगता तो बहुत मुश्किल हो सकती थी, मगर संगमचट्टी में आराम से हम कार बैक कर ही लेते ,इतनी जगह तो थी वहां पर। स्पीड पर ज्यादा फर्क नही पड़ा,पहले की तरह ही फर्स्ट गियर में चल रही थी कार।
9 बजे जैसे-तैसे संगमचट्टी पहुंच गये......अख़रोट के पेड़ के नीचे कार पार्क कर दी......यहाँ दो दुकाने हैं एक तो बन्द थी और एक खुली थी..... दुकान में मैग्गी बनवाई.....तीन चार ड्राइवर थे दुकान पर ,सवारियों का इंतजार कर रहे थे ......
हम टेंट वगैरह सब ले कर आये थे......
इन लोगों ने कहा अगर आज ही डोडीताल पहुंच जाओगे तो टेंट की जरूरत नहीं है ...... हम भी आज ही डोडीताल पहुँचना चाहते थे,इसके दो फायदे थे एक तो टेंट, स्लीपिंग बैग, मैट्रेस ढोने से बच जाते और दूसरा एक दिन पूरा बच जाएगा तो सेममुखेम की यात्रा भी हो जाएगी.........
मैग्गी खाकर 10:10 AM पर हम संगमचट्टी से पुल पार करने के बाद अगोड़ा की और पैदल चल दिये। पुल पर एक आदमी ने पूछा"आप लोग डोडीताल जा रहे हो ,वहाँ हमारा होटल है।"
हमने पूछा, "और भी लोग गये हैं क्या आगे डोडीताल की ओर?"। बोला ," हाँ दो लोग आपसे लगभग 3 किमी. आगे चल रहे हैं।" रास्ते में हमें कहीं भी वे दोनों बन्दे नहीं मिले।
अगोड़ा अंतिम गाँव है और संगमचट्टी से 6 किमी दूर है।
2012 में जो आपदा आयी उसने काफ़ी कुछ तबाह कर रखा है यहाँ.........रास्ता ख़राब हो गया है.....और संगमचट्टी की दुकानें भी सारी बह गई थी इस आपदा में......करीब 4 किमी चलने के बाद पानी मिल जाता है ...एक प्रतीक्षालय भी बना है,यहां पर थोड़ा पानी और बिस्किट खाए। धीरू भाई ने मनमोहन भट्ट को मैसेज किया "क्या रे भाई कन लग्यूँ?" जब हम लोग पिछले साल जून में पँवालीकांठा गये थे तो वहां पर एक ताऊ जी के यहाँ हमने रात को खाना खाया था, वो लोग टिहरी के थे और ऐसी ही भाषा (बोली)का प्रयोग कर रहे थे। ऊपर जो धीरू भाई ने कहा उसका अर्थ होता है"अरे भाई क्या कर रहे हो?"
गढ़वाली तो हम भी हैं मगर हमारा बोलने का लहजा थोड़ा अलग है .....
यहाँ से( प्रतीक्षालय, जहाँ पर पानी है) एक रास्ता बायीं और भंकोली गाँव के लिए जाता है......हमने सीधे अगोड़ा की ओर जाना था....पानी पीकर हम आगे बढ़ गए..... कुछ दूरी पर अगोड़ा गांव नजर आने लगा....काफी बड़ा गांव है अगोड़ा..... गाँव के अंत में एक लॉज मिला नाम था भारत लॉज .... काफी बार सुना था ये नाम ....नीरज मुसाफ़िर ने भी अपने यात्रा में इसका जिक्र किया था.......थोड़ा इन महाशय जी के बारे में बताता हूँ, इनसे आमने-सामने कभी मुलाकात तो नहीं हुई पर इनके यात्रा ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते हम दोनों फ़ेसबुक मित्र बन गए। और आज इन्ही से प्रेरित होकर मैं ये ब्लॉग लिख पा रहा हूँ।
मशहूर घुमक्कड़ /ब्लॉगर( और अब लेखक भी बन गए हैं) नीरज मुसाफ़िर मूलत: मेरठ जिले के हैं..……वर्तमान में दिल्ली मेट्रो में कार्यरत हैं.……… नम्बर एक घुमक्कड़ हैं, और अपने सभी यात्रा वृतांत अपने ब्लॉग पर प्रभावशाली ढंग से लिखते रहते हैं…....
अभी सितम्बर में पँवाली कांठा ट्रैक कर चुके हैं........ इनसे मुलाकात तो नहीं हो पाई लेकिन फोन से बात हुई.…...आने से पहले इन्होंने मुझे मैसेज कर दिया था और मैं मैसेज तब पढ़ पाया जब ये गुप्तकाशी पहुंच चुके थे तब इनको फोन लगाया कि बसुकेदार आ जाओ ,कहा समय नहीं है….. अगली बार अवश्य आएंगे, यह वादा करके चले गए। खैर अगली बार तक इनकी प्रतीक्षा रहेगी।
अगोड़ा में यह भारत लॉज राजेश पंवार जी का है..............अगोड़ा की समुद्रतल से ऊँचाई है 2128 मीटर......
और समय था 12:10PM.
यहाँ पर एक बुजुर्ग महिला मिली....शायद राजेश पँवार जी की माता जी थीं.....उनकी भाषा मुश्किल से हमारी समझ में आ रही थी, दूध नहीं था तो ब्लैक टी पिलाई...फ़ोटो खींचे गये..... माता जी के साथ भी....... यहाँ से चलते समय माता जी ने एक ककड़ी का टुकड़ा भी दे दिया, अभी चाय पी थी तो बाद में रास्ते में खाने के लिए बैग की जेब में रख दिया।
अगोड़ा के बांयी तरफ थोड़ा ऊपर धासड़ा गाँव है,और फिर धंदागला गाँव, और फिर भंकोली गाँव ..........
अगोड़ा से करीब 1 किमी तक चढ़ाई है फिर 1 किमी की उतराई के बाद एक छोटी नदी को पार कर आता है बेबरा चट्टी ......ऊँचाई 2190 मीटर...
बेबरा चट्टी एक घाटी में है ...चट्टी का अर्थ पड़ाव होता है.... यहाँ पर आठ- दस झोपड़ियां कुछ दुकानें हैं..... केवल एक ताऊ जी की दुकान खुली थी बेबरा चट्टी में .....अगोड़ा के ही रहने वाले थे ये ताऊ जी.......
पानी पिया गया पर चाय नहीं.....क्योंकि घर का दूध नही था इसलिए। बेबरा चट्टी में हम .1:15PM पर पहुंचे थे…...
संगम चट्टी से लगातार अगोड़ा गाँव से एक किमी आगे तक जो मोबाइल नेटवर्क अच्छी तरह काम कर रहे थे अचानक यहाँ आते ही गायब हो गए। बेबराचट्टी पहुंचने से ठीक पहले एक छोटी नदी को पार करना पड़ता है, जिसे हम गलती से अस्सी गंगा समझ बैठे थे,(जबकि असली अस्सी गंगा यहाँ से ठीक 1 किमी नीचे इसी नदी से संगम करती है) हम दोनों सारे रास्ते ये चर्चा करते रहे कि ये नदी तो कहीं और से ही आ रही है जबकि हमने पढ़ा है अस्सी गंगा तो डोडीताल से निकलती है.......और जब धारकोट की तरफ जा रहे थे तो दायीं तरफ ठीक नीचे घाटी में अस्सी गंगा दिखाई दे गई, फिर सारा माजरा समझ में आया।
लगभग 15 मिनट आराम करने के बाद हम बेबरा चट्टी से धारकोट(छतरी) की ओर चल दिये जो बेबरा से 4 किमी की चढ़ाई पर है.........
रास्ते मे शॉर्टकट रास्ता मिला पर हम मुख्य मार्ग पर ही चलते रहे……...रास्ते में अखरोट के पेड़ थे धीरू भाई ने दो चार अख़रोट उठा लिए थे....जिनका स्वाद हमने छतरी पहुंचने से पहले ले लिया था.......
2:30PM पर हम धारकोट यानि छतरी नामक स्थान पर पहुँच गये ...... यहाँ पर एक छतरीनुमा टिन शैड है इसीलिए इस स्थान को स्थानीय लोग छतरी कहते हैं। बाकी कुछ नहीं है यहाँ पर.......
थोड़ा आराम फरमाया.... मोबाइल नेटवर्क फुल था तो एक वीडियो बना कर ग्रुप में सेंड कर दिया और घर पर भी बात हो गयी।
धारकोट की ऊँचाई थी 2625 मीटर(जबकि यहाँ 2500 मीटर लिखा था)..........धारकोट से थोड़ा ऊपर जाकर बायीं ओर एक पत्थर पर लिखा था "भुत बिजार देवता", और दायीं ओर एक पेड़ पर कुछ लाल रंग के झंडे लगे थे.......शायद यहीं पर ये देवता रहा होगा।
अब हमें यहाँ से हल्की- हल्की चढ़ाई चढ़नी थी कचेरू की ओर,कचेरू धारकोट से ढाई किमी पर है।कचेरू में हमें एक पानी के नाले के अलावा कुछ भी नहीं दिखा, न कोई झोपड़ी न कोई दुकान। 3:15 PM पर हम कचेरु में थे। हम बिना रुके आगे बढ़ते रहे.........कचेरु से आधा किमी आगे वो जगह है जहाँ पर दयारा बुग्याल सतगड़ी वाला रास्ता भी मिल जाता है, इस स्थान की ऊँचाई 2808 मीटर है। यह रास्ता नीचे सतगड़ी की तरफ से आता है। यहाँ पर बायीं तरफ एक बोर्ड भी है जिस पर लिखा है माँझी कैम्पिंग स्थल 2 किमी., डोडीताल 7 किमी, दयारा बुग्याल (दायीं तरफ )15 किमी...........3:25 पर हम इस तिराहे पर पहुँच गये थे। अगर हमारे साथ इस यात्रा में एक दो साथी और आ जाते तो हम भी शायद दयारा बुग्याल सतगड़ी हो कर ही आते । मगर हम दो ही थे इसलिए संगमचट्टी से आना पड़ा।
अब यहाँ से माँझी की ओर चलना था ,हल्की चढ़ाई थी। ठीक 4 बजे हम मांझी पहुँच गये, ऊँचाई थी 2965 मीटर। माँझी में लगभग 35-40 झोपडियां थी, 8-10 तो जीर्णशीर्ण थी, बाकी ठीकठाक रहने लायक थी,मगर आज यहाँ हमें कोई नहीं मिला ,दुकानें भी थी वो भी बन्द मिली। थोड़ी देर आराम किया ,बिस्किट, और नमकीन खाई,........फिर आगे बढ़ चले।
माँझी से डोडीताल की दूरी है 5 किमी, चढ़ाई ज्यादा नहीं थी ,हल्की सी चढ़ाई थी या यूँ कहिए चढ़ाई थी ही नहीं ,मैं तो इसे चढ़ाई नहीं मानता। धीरू भाई ने कहा "5:30 PM बजे हम डोडीताल पहुँच जाएंगे शायद।"
माँझी से ठीक सामने दायीं तरफ डोडीताल वाले रास्ते के ऊपर एक पान के पत्ते की आकृति जैसा पर्वत दिखाई दिया,इस आकृति के चारों तरफ पेड़ थे,और बीच का हिस्सा खाली था, हमने इसे पान पर्वत नाम दे दिया।
मांझी और डोडीताल के बीच पानी ही पानी मिलेगा आपको,छोटे-छोटे नाले हर 50-100 मीटर पर हैं।
जब हम डोडीताल की और चलते जा रहे थे तो अचानक एक जगह धीरू भाई ने कहा रुक जाओ, वो देखो मोनाल, रास्ते में मोनाल था, बहुत ही प्यारा था मगर जब तक कैमरा निकाला उड़ गया। फ़ोटो नहीं ले पाए इसका थोड़ा दुःख हुआ। कुछ ही आगे गये तो फिर से एक मोनाल दिखाई दिया। शायद पहले वाले का जोड़ीदार था।वो भी हमें देखते ही उड़ गया। इससे पहले हमें माँझी के नीचे एक घुरड़ दिखाई दिया था,वह भी बहुत प्यारा था।
5:05PM पर हम भैरवनाथ मन्दिर पहुँच गये......यहाँ की ऊँचाई थी 3124 मीटर जबकि बोर्ड पर लिखा है 2900 मीटर,यहाँ पर भैरवनाथ मन्दिर की मरम्मत का कार्य चल रहा था।
यहाँ से डोडीताल तक हल्की ढलान है ,और डोडीताल की ऊँचाई है 3050 मीटर। यानि भैरव मन्दिर डोडीताल से ऊँचाई पर ही होना चाहिए , जबकि यहाँ की ऊंचाई डोडीताल से कम 2900 मीटर दर्शायी गयी है जोकि मेरे हिसाब से गलत है, मेरे मोबाइल का जी पी एस भी 3124 मीटर दिखा रहा था। यहाँ से डोडीताल की दूरी 1 किमी से थोड़ा ज्यादा है,और इस दूरी को हमने 15 मिनट में तय कर लिया, ठीक 5:20 PM पर हम डोडीताल पहुँच गये। हम सुबह 10:10 पर हम संगमचट्टी से चले थे,और 5:20 PM पर हम डोडीताल पहुँच गये.........लगभग 7 घण्टे लगे हमें 22 किमी.चलने में आज, यानि एक घण्टे में 3 किमी से ज्यादा चले औसतन । अच्छी खासी स्पीड कही जा सकती है। इस साल जब रक्षाबन्धन में हम लोग केदारनाथ से वासुकीताल ताल गये थे ,हमने केदारनाथ से जय विजय धार तक 6 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ने में 4 घण्टे लगाए थे। उस हिसाब से डोडीताल ट्रैक की चढ़ाई थोड़ा कम है।
हम सीधे पहले झील तक गये, झील को निहारा, और दूर से ही गणेश मन्दिर के दर्शन कर लिये.............. दूर से इसलिए क्योंकि सुबह तो दर्शन करने ही थे नहा -धोकर ।अस्सी गंगा के ऊपर एक पुलिया बनी है उस पार एक आदमी बैठा था, बिना पुलिया पार किये ही हमने उससे पूछा पँवार का होटल कहाँ पर है तो पीछे की तरफ (जिधर से हम आये थे) इशारा करते हुए बोला ("वो रहा होटल,लेकिन आज नहीं है वो यहाँ पर। ढाबा बन्द था, हम आखिरी(डोडीताल आते समय पहले)
वाली दुकान में चले गए,दरवाजे पर ही एक आदमी मिला। ।मैने पूछा "भाई जी बलबीर पँवार जी कहाँ मिलेंगे?" बोले" मैं ही हूँ बलबीर पँवार। बलबीर पँवार का नाम काफी सुना था ,गाइड का काम करते हैं और अगोड़ा के ही रहने वाले हैं। अन्दर गये तो जो दो बन्दे हम से पहले चल रहे थे दोनो बैठे हुए थे। मनवीर सिंह चाय बना रहा था,मनवीर मूल रूप से नेपाली है और काफी सालों से फॉरेस्ट रैस्ट हाउस में चौकीदार है। और आज रात हमारे रहने और खाने की सारी व्यवस्था मनी ही करने वाला है।
मनी ने हमको कमरा दिखाया और कहा "जब तक खाना बनता है आप लोग आराम कर लो"।
चाय पी कर हम आराम करने कमरे में चले गए। लगभग 8 बजे बलवीर पँवार हमें बुलाने आ गए,बाहर से ही बोले-"सर खाना बन गया, चलिए खाना खाने।" मैने कहा "सर मत बोलिए, हम भी गढ़वाली ही हैं, भाई कहिए या भैजी भी चलेगा पर सर नहीं।" बोले सर आदत हो गई 'सर' बोलने की।
भूख भी लग गई थी ,जल्दी से खाना खाने नीचे ढावे पर चले आए। खाना बहुत ही अच्छा बना था अन्त में थोड़ा भात(चावल) भी खा लिया। मजा आ गया खाने में...….…संगमचट्टी से मैग्गी खाकर चले थे, और रास्ते में बिस्किट और नमकीन के अलावा कुछ भी नहीं खाया था। जल्दी से खाना खा कर कमरे में चले गए।
आज लक्ष्मी पूजन है, बड़ा ही शुभ दिन है, और हम दीवाली की रात भगवान गणेश की जन्मस्थली में आये थे,इससे बड़ी खुशनसीबी की बात और क्या हो सकती है। हमेशा याद रहेगी यह यात्रा।
पूरी यात्रा में हमें कहीं भी दोस्तों की कमी नहीं खली थी, बहुत ही आनन्द आया था सफर में….…...........मगर जब हमने तास (प्लेइंग कार्ड) निकाले,और लद्दू गेम खेलने लगे तो फिर लगा कि एक-दो बन्दे और होते तो खेलने का मजा आ जाता। एक ही गेम खेल पाए......और जल्दी ही सो गए। कल डोडीताल और गणेश मन्दिर के बारे में जानेंगे.......तब तक के लिए शुभ रात्रि।
आगे यात्रा जारी है.......
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| धारकोट से आगे बिजारकोट देवता वाला पेड़ |
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| धारकोट से थोड़ा आगे पत्थर पर यूँ लिखा है। |
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| संगमचट्टी से इस पुल को पार करते हुए ट्रैक की शुरुआत होती है। |
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| भारत लॉज अगोड़ा |
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| पीछे माँझी की छावनियाँ |
भैरवनाथ मन्दिर की गलत ऊंचाई दर्शाता बोर्ड
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| बेबरा और धारकोट के बीच अखरोट का आनन्द लेते हुए |
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| माँझी से डोडीताल वाले रास्ते के ऊपर पान के पत्ते की तरह दिखता जिसे हमने पान "पर्वत नाम" दिया। |
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| कैप्शन जोड़ें |
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| भारत लॉज अगोड़ा में ब्लैक टी का आनन्द लेते हुए। |










वाह ब्लैक टी,यात्रा वृत्तान्त बहुत अच्छा है।
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