सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नचिकेता ताल/डोडीताल/सेममुखेम की यात्रा:-01


नचिकेता ताल के बाबा जी


चौरंगीखाल में नचिकेता ताल जाने का गेट

नचिकेता ताल

मौसी जी के घर पर

केमुण्डा खाल का मन्दिर

नागेश्वरसौड़ से आगे प्राथमिक विद्यालय पैरकर


            दिनाँक 18 अक्टूबर 2017...............
   
                "आज बसुकेदार से डुंडा "

    जब कुछ दिन पहले  अवकाश तालिका देखी तो मन में घुमक्कड़ी जागृत हो उठी,कि कहाँ जाया जाय ......उड़ान ग्रुप में डोडीताल का जिक्र भी कर दिया.....(उड़ान ग्रुप हम कुछ बसुकेदार के घुमक्कड़ मित्रों का ग्रुप है) पर दीपावली के कारण धीरू भाई के अलावा किसी ने भी हामी नहीं भरी.... हमारे ग्रुप के कुछ स्थाई घुमक्कड़ हैं जिन साथियों ने मेरे साथ काफी जगहों पर ट्रैकिंग की है.....

1- मनमोहन भट्ट:---...….मेरी तरह अध्यापक हैं ,घूमने फिरने के काफी शौकीन हैं मगर कुछ समय से स्वास्थ्य कारणों से ट्रैकिंग से तौबा कर ली है। मेरे साथ रुद्रनाथ,हेमकुण्ड साहिब,फूलों की घाटी,पँवाली कांठा ट्रैक कर चुके हैं।और सन् 2000 की नंदादेवी राज जात,पिंडारी ग्लेशियर, विषुड़ी ताल, ट्रैक कर चुके हैं।

2-मोहन भण्डारी:--…...वर्तमान में डालसिंगी गाँव के ग्राम प्रधान हैं, घुमक्कड़ी का काफी शौक रखते हैं......ट्रैकिंग करने में कोई समस्या नहीं, पैदल चलने में माहिर है, लेकिन विभागीय एवं ग्राम पंचायत के कार्यों से समय नहीं निकाल पाते......फिर भी मेरे साथ रुद्रप्रयाग जनपद की अति दुर्गम यात्रा मंनणी माई जात(जो हर वर्ष सावन के महीने राकेश्वरी मन्दिर राँसी से मंनणी धाम तक होती है),पँवाली कांठा,हेमकुंड साहिब,फूलों की घाटी, ट्रैक कर चुके हैं।

3-.वीरेंद्र पंखोली :--....…...ये भी अध्यापक हैं ...सीमांत गाँव माणा के हैं.....लेकिन घर दूर होने के कारण छुट्टियोँ में घर जाना पहली प्राथमिकता है.....वासुकीताल-केदारनाथ,सतोपंथ,मध्यमहेश्वर,कालीशिला,देवरियाताल, ट्रैक मेरे साथ कर चुके हैं।

4- अखिलेश सजवाण:--.....…ये भी अध्यापक हैं..और पंखोली जी के साथ एक ही विद्यालय में कार्यरत हैं......और रिश्ते  में मेरे जवांई जी लगते हैं......मेरे साथ पँवाली कांठा,सतोपंथ, देवरिया ताल ; मध्यमहेश्वर ट्रैक कर चुके हैं।......कुछ समय से,ज्यादा पैदल चलने से परहेज है......

5- कैलाश भट्ट:--......बसुकेदार में इलेक्ट्रॉनिक्स, डी जे/टेंट की दुकान है.......पँवालीकांठा ट्रैक मेरे साथ कर चुके हैं,,वैसे ये भी मनमोहन भट्ट के साथ नन्दादेवी राजजात कर चुके हैं...........

6- धीर सिंह बिष्ट (धीरू भाई):--….......पेशेवर फोटोग्रॉफर हैं, 2013 की आपदा में अगस्त्यमुनि-विजयनगर में दुकान कैमरों सहित बह गई। काफ़ी नुकसान हुआ इनका,.....घूमने के बहुत शौक़ीन हैं.…..कभी भी कहीं भी चलना हो तो मना नहीं करते...... न ही कोई बहाना बनाते हैं......इनसे पहली मुलाकात खोम भैरवनाथ मंदिर(रुद्रप्रयाग जनपद) में हुई;और नंदादेवी राजजात 2014 इनके साथ पहला ट्रैक था,बहुत यादगार और बहुत कुछ सिखाने वाली यात्रा रही थी यह।.....तब से मध्यमहेश्वर को छोड़ कर हर ट्रैकिंग में मेरे साथ रहे।
हमारी इस डोडीताल यात्रा के लिये पहले प्रधान जी(मोहन भण्डारी जी) भी तैयार थे पर आखिरी क्षणों में गाँव की आवश्यक बैठक आहूत होने से नही आ पाए…......अब हम दो साथी ही रह गए इस यात्रा पर जाने के लिए.........एक बार लगा कि इस बार भी डोडीताल यात्रा पर पानी फिर जाएगा,पिछली बार भी जून में डोडीताल का कार्यक्रम रद्द हो चुका था,तब मनमोहन भट्ट के पैदल चलने की असमर्थता के कारण हमें अचानक नीति-मलारी का कार्यक्रम बनाना पड़ा,…..और इस बार फिर से वही बात हो रही थी,अगर धीरू भाई भी मना कर देते तो मैं भी अकेले नहीं जा पाता, हालांकि मैंने कहा जरूर था कि "कोई आये या न आये मैं तो अवश्य जाऊंगा"...........लेकिन जब मैंने धीरू भाई को फोन पर पूछा कि"क्या प्रोग्राम है भैजी?".......तो धीरूभाई के सकारात्मक उत्तर  ने डोडीताल जाने के शुभ संकेत दे  दिए.........कहने लगे "यार जब नीरज जाट(मुसाफ़िर)दिल्ली का हो कर केवल अपनी पत्नी के साथ पँवाली कांठा की यात्रा कर सकता है... तो हम  डोडीताल क्यों नहीं जा सकते...."
18 अक्टूबर को यानि छोटी दीवाली की सुबह 6:.50 पर मैं घर (बसुकेदार) से अकेले ही अपनी लक्की कार वैगन-आर से निकला.....पठालीधार से धीरू भाई को कॉल कर दी कि तैयार हो कर विजयनगर बाजार में आ जाएं.....पर  धीरू भाई तो  सड़क में पहले से ही पहुँचे थे.........07:35 पर में विजयनगर(अगस्त्यमुनि) पहुंच गया.... यहां से धीरूभाई सम्पूर्ण यात्रा में मेरे साथ रहेंगे...... 7:55 पर हम तिलवाड़ा मैं थे........तिराहे पर सभी टायरों में हवा चैक करवाई....... और मयाली की और दायीं तरफ मुड़ गये......वैसे मयाली के लिए बसुकेदार से 7 किमी आगे से भी सड़क जाती है,दूरी भी लग भग बराबर ही है...पर धीरू भाई अगस्तमुनि में थे इस कारण इस रास्ते आना पड़ा.......ठीक8:37 पर हम मयाली पहुँच गये,हमे पैट्रोल भरवाना था सो जखोली वाली सड़क पर आधा किमी आगे जाना पड़ा.....पेट्रोल भरवाकर मयाली तिराहे से हम ठीक 08:45 पर चले .........धीरूभाई को बोल दिया कि आप हर स्टेशन की दूरी और समय नोट करते रहें.......ठीक 10:23 पर हम घनसाली बाज़ार में थे....... चमियाला से आगे तुंगाणा गाँव में मेरी मौसी का घर है,और हमें वहीं से गुजरना था सो घनसाली तिराहे से मिठाई ले ली.....इस तिराहे से सीधी सड़क चम्बा वाली है और दाईं तरफ वाली चमियाला जाती है...भिलंगना नदी  पर बने पुल को पार करके हमें बायीं वाली सड़क पर जाना था....दायीं तरफ वाली सड़क घुत्त्तू(30 किमी) जाती है ....जहाँ से पँवाली कांठा,खतलिंग ग्लेशियर सहस्त्र ताल का रास्ता है।चमियााला घनसाली से 10
किमी की दूरी पर है.....जाम हमेशा लगता है इस मार्केट में, गाड़ी वाले वीच सड़क में गाड़ी खड़ी करके इधर उधर दुकानों में चले जाते हैं ......लगभग 15 मिनट बाद निकल पाए जाम से....... जैसे ही हम चिरबिटिया के बाद टिहरी जिले की सीमा में पहुँचे जगह जगह खेतों में क्रिकेट टूर्नामेंट हो रहे थे,  क्रिकेट का सीजन जल्दी शुरू हो गया यहाँ, हमारे रुद्रप्रयाग जिले में अभी शुरू नहीं हुआ है। शायद नवम्बर में शुरू होंगे,............     मौसी के घर से 1 किमी पहले मौसी का छोटा बेटा अनुराग(अन्नु) अपने दोस्तों के साथ  पैदल चलता हुआ दिखाई दिया ,मैंने जैसे ही देखा कार रोक दी। बाहर उतर कर छोटे भाई से मुलाकात की...........पूछा तो उसने कहा "हमारा मैच है आज ,क्रिकेट खेलने जा रहा हूँ।..... वो भी जल्दी मैं था और हम भी....सो आगे बढ़ गए.......
ठीक 11:45 पर हम मौसी के घर पर पहुँच गये.....बड़ी मौसी ने बड़े प्यार से हम दोनों को नाश्ता करवाया,वैसे हम घर से नाश्ता कर कर गए थे......इसके बाद हमें शाम तक कहीं भी खाना खाने की जरूरत नहीं पड़ी।.........दोनो मौसियों  और नानी जी के साथ कुछ सेल्फ़ी लेने के बाद हम 12:20 पर तुंगाणा से यह वादा करके चल दिये कि वापसी में यहीं आकर ठहरेंगे.....पर ये हो न सका....वापसी में हम लम्बगाँव होकर आए क्योंकि नीरज मुसाफ़िर की तरह हमें भी  सर्कुलर यात्राएँ पसन्द हैं ........... तुंगाणा से दो किमी आगे नागेश्वरसौड़ नामक छोटा सा मार्केट है….....मैं यहीं तक पहले आ चुका था। धीरू भाई भी यहीं पास के किसी गाँव में किसी शादी कार्यक्रम में आये थे.......अब इससे आगे की जगहें हम दोनो के लिए अनजान थी........नागेश्वर सौड़  से आगे हम दोनों ही नहीं गए थे.......... अब तक हम सीधे बिना ज्यादा रुके ही चल रहे थे लेकिन अब नई जगह होने के कारण बार बार रुकना पड़ रहा था। नागेश्वर सौड़ से कुछ आगे से चढ़ाई शुरू हो जाती है..........चढ़ाई में ही डुंडा से  नैथानी जी का फ़ोन आ गया, बोले कहाँ पहुँचे भाईजी "चढ़ाई चढ़ रहे हैं भैजी " हमने भी कह दिया...... कहने लगे"केमुण्डाखाल में जरूर रुकना, मैग्गी-वैगी खा लेना वहां पर"।
थोड़ा नैथानी जी के बारे में बता दूं, क्योंकि आज हमें इन्ही के घर पर रुकना है, और डोडीताल से वापसी में भी.....
नैथानी जी हमारे संकुल संसाधन केंद्र में ही अध्यापक हैं और प्रशिक्षण के दौरान डाइट रतूड़ा में मनमोहन भट्ट के रूममेट रह चुके हैं। मूल रूप से से बुढ़ना( रुद्रप्रयाग) के हैं ,इनके पिताजी उत्तरकाशी जिले में स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे तो वहीं डुंडा में ही मकान बना दिया, तब से वहीं के निवासी हो गए................
 केमुण्डाखाल तक चढ़ाई है।फिर ढलान ......   केमुण्डाखाल 2300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है.....और यहाँ पर एक मंदिर भी है.....यहां से उत्तरकाशी 63 किमी रह जाता है...... केमुण्डाखाल में हमने मैग्गी तो नही खाई लेकिन करीब 15 मिनट जरूर रुके,  और प्रकृति के नजारों का आनंद लिया..... वाकई में बहुत खूबसूरत जगह है केमुण्डाखाल.........…
रास्ते में  कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा था कि  इस यात्रा में हम दो ही चल रहे हैं....धीरूभाई के साथ सफर का पता ही नहीं चल रहा था, सच मजाकिया स्वभाव यात्रा में बहुत काम आता है, हर बार कुछ नया लेकर आते हैं ,चुटकुलों ने तो सफर को और भी रोमांचित और आनन्दित कर दिया.....…...
अब हमें लगातार ढ़लान पर ही चलना था......... लगभग 1.50PM पर हम उस तिराहे पर पहुंचे जहाँ से दायीं तरफ लंबगाँव वाली सड़क कट जाती है,दूरी थी बसुकेदार से 145 किमी...........वापसी में हमें इसी लम्बगाँव वाले मार्ग से जाना है पीपलडाली- मलेथा हो कर.........
यहाँ पर कोई दुकान वगैरह नहीं थी पर कुछ नाम तो जरूर होगा......
एक आदमी से धीरू भाई ने पूछा भाई जी कौन सी जगह है यह?"यहाँ से एक सड़क लम्बगाँव जाती है।"उस आदमी ने कहा। यह तो हम भी जानते हैं भैजी,, "नाम क्या है इस जगह का?" इस बार मैने पूछा, बोला"किठ्ठा कहते हैं इस जगह को" नाम सही है या गलत पता नहीं.................
ठीक 2:09 PM पर हम कोडार नामक तिराहे पर पहुंचे ,कुछ दुकानें भी हैं यहाँ पर.......बसुकेदार से  दूरी है 153.4 किमी.
यहाँ से एक सड़क दाईं तरफ सेममुखेम(नागराजा मंदिर) को चली जाती है ,सेममुखेम यहाँ से 24 किमी है..........
सेममुखेम जाने की इच्छा थी मन में, हिसाब किताब लगाने लगे----एक घन्टे में तलबला सेम,फिर पैदल ,1 घण्टा और। एक तरफ के दो घण्टे ,यानि वापस इसी जगह(कोडार) पहुँचने में लगभग चार साढ़े चार घण्टे लग जाएंगे, यानि 6:30PM तक ही वापस आ पाएंगे, अँधेरा हो जाएगा, डुंडा अभी भी 52-53 किमी दूर है यहाँ से....यानि डुंडा पहुँचेंगे लगभग 8:30, 9 बजे ,देर हो जाएगी,फिर कल सुबह डोडीताल जाना है तो जल्दी उठना पड़ेगा,देर से सोएंगे तो जल्दी उठना थोड़ा मुश्किल होगा, काफी सोच विचार करने के बाद सेममुखेम न जाना तय हुआ.......….
अचानक बोर्ड पर नजर पड़ी लिखा था नचिकेता ताल 18 किमी. लिखा था कोडार से......इस रास्ते तो हमने वैसे भी जाना ही है.....जो समय लगना था वो पैदल चलने में ही लगना था।
"पैदल बस 3 किमी, यहाँ तो जा ही सकते हैं" धीरू भाई बोले।
मैने भी हामी भर दी.........क्योंकि नचिकेता ताल जाने के लिए हमारे पास पर्याप्त समय था.......... और फिर हम चौरंगीखाल की तरफ़ चढ़ाई वाली सड़क की और बढ़ गए।
बसुकेदार(रुद्रप्रयाग जनपद) से जब  सुबह मैं निकला था तो अकेला था ......... मन में नचिकेता ताल का कोई कार्यक्रम नहीं था.......
मैं श्रीनगर-मलेथा से पीपलडाली-लंबगांव होते हुए जाना चाहता था मगर धीरू भाई ने चमियाला मार्ग से जाने की इच्छा जताई …....
ठीक 2:45PM पर हम चौरंगीखाल में थे। बसुकेदार से दूरी थी 169 किमी.
चौरंगी खाल पहुंचते ही बोर्ड पर नचिकेता 3किमी लिखा था।
उत्तरकाशी से 29किमी की दूरी पर स्थित नचिकेता ताल एक बहुत ही सुंदर झील है। झील के चारों ओर देवदार, चीड़, और बुरांश  के वृक्ष हैं, जो इस जगह की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। ऐसा माना जाता है कि नचिकेता झील के किनारे ऋषि उदालक के पुत्र नचिकेता ने तपस्या की थी।

उत्तरकाशी से 27 किमी दूर चमियाला-घनसाली सड़क मार्ग पर 2,300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित चौरंगीखाल से पर्यटक नचिकेता ताल जा सकते हैं।
बसुकेदार से चौरंगी खाल की दूरी घनसाली-चमियाला  मोटर-मार्ग से 169 किमी है.…………और यहाँ तक पहुंचने में हमें  लगभग 6:30 घण्टे लगे........
 पर्यटकों को चौरंगीखाल से नचिकेता ताल तक पहुँचने के लिए 3 किमी(मुझे 2 किमी ही लगा) पैदल चलना पड़ता है……....
चौरंगीखाल में चौरंगीनाथ  मंदिर के दर्शन करने के बाद  पानी की एक बॉटल लेकर हम 45 मिनट में हम दोनो नचिकेता ताल पहुंच गए….............
यहाँ पर एक साधुबाबा रहते हैं.........तीन कुत्ते भी इन्ही के साथ रहते हैं यहाँ कुटिया में...........बाबा जी ने रुकने के लिए कहा लेकिन हमें अगले दिन  डोडीताल जाना था इसलिए आज हर हाल में नैथानी जी के घर डुंडा पहुंचना जरूरी था.......
बाबा जी से कहा "अच्छा बाबाजी चलते हैं"........
बाबा जी ने कहा"जाने के लिए नहीं कहूंगा लेकिन दुबारा आने के लिए अवश्य  कहूँगा".......…
हम भी दुबारा आने का वादा करके चल दिये….........और हाँ एक बात बताना भूल गया.......कि नचिकेता ताल 2450 मीटर की ऊँचाई पर है.……….. देवरियाताल से 50 मीटर ज्यादा  है........…...
5:13PM पर हम चौरंगीखाल से चल दिये......….
रास्ते में फिर से नैथानी जी का फोन आ गया। कहने लगे "मैच खेलने गये थे हार गए" ,चलो कोई बात नहीं हार-जीत तो लगा धंधा है। बोले संकूर्णाधार से दाहिनी ओर मुड़ जाना......
रास्ते में एक तिराहा आया,बांयी  तरफ लिखा था धरासू बैंड 40 किमी. और सीधे लिखा था उत्तरकाशी 17 किमी........समय था 5:37PM , हम कन्फ्यूज़ हो गए, हमने सोचा था संकूर्णाधार कोई छोटा सा मार्केट होगा मगर यहाँ पर कुछ नहीं था बांयी  तरफ धरासू वाली सड़क पर एक बहुत छोटा सा मन्दिर था बस.........
नैथानी जी को फोन लगाया हमने कहा"जहां से धरासू बैंड की सड़क कटती है वहाँ पहुंच गए हम लोग " बोले" अरे यार धरासू बैंड क्यों चले गए वापस आ जाओ, बहुत गलत चले गए तू लोग"। शायद उन्होंने केवल धरासू बैंड ही सुना । हमने कहा कि हम धरासू बैंड नहीं बल्कि उस जगह पर हैं जहाँ से धरासू की सड़क अलग हो जाती है,कहीं भी डुंडा नहीं लिखा था, हम ये सोच रहे थे अभी और आगे से शायद डुंडा की सड़क कटेगी। मगर हम गलत थे, हमें यहीं से धरासू बैंड वाली सड़क पर जाना था डुंडा के लिए.......... जब कन्फर्म हो गया तो हम इसी सड़क की ओर बढ़ चले।
यहां से डुंडा 27 किमी है जो बाद में पता चला।  6:35PM पर हम गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर देवीधार नामक स्थान पर पहुंच गए…….,यहाँ से बांयी ओर धरासू की सड़क है और दायीं ओर उत्तरकाशी की। हमें दायीं तरफ उत्तरकाशी वाली सड़क पर जाना था,....….इससे पहले मिठाई आदि खरीदी जाय, अब तो मात्र 3.5 किमी का सफर रह गया था आज का। देवीधार से 15 मिनट में ही हम डुंडा पहुंच गए। ठीक 6:50 PM पर।क्या गजब का इत्तफ़ाक था ठीक 6:50 पर ही घर से मैं चला था और डुंडा भी पहुंचे 6:50 पर ही।पूरे 12 घण्टे का सफर रहा आज का.......डुंडा से उत्तरकाशी 16 किमी और है ,खैर वहाँ तो कल सुबह ही जाना है............
नैथानी जी को कॉल की तो 10 मिनट में लेने आने के लिए कह गए....प्रत्येक 10 मिनट में कॉल की फिर वही   जबाब 10 मिनट में आ रहा हूँ। पूरा एक घण्टा इंतजार करवाया नैथानी जी ने। बाद में पता चला वो किसी काम से उत्तरकाशी की तरफ गये थे............इसलिये देर हो गई........लगभग 8 बजे हम नैथानी जी के घर पर थे......….अपने अपने घर फ़ोन कर दिया कि सकुशल डुंडा पहुंच गए। 
आज  छोटी दीवाली है तो कुछ दोस्त लोग भी आये थे उनके घर में, सबसे परिचय हुआ।कुछ देर बाद दोस्त चले गए।हम भी जल्दी खाना खाकर सो गए। सुबह जल्दी उठना था न इसलिए………….………...................शुभ रात्रि

    आगे ........   कल चलेंगे डोडीताल

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

*डोडीताल यात्रा 02*

दिनाँक 19 अक्टूबर 2017 :-----                     "आज डुंडा से डोडीताल " हर दिन की तरह ठीक सुबह 5:30 बजे मेरे मोबाइल में अलार्म बज गया,नींद खुल गई, धीरू भाई को भी जगा दिया,पर जैसे ही मैं फ्रैश होने गया धीरू भाई फिर सो गए।हाथ-मुँह धो कर आया तो फिर से धीरू भाई को जगाना पड़ा।तैयार होते-होते 6:30 बज गए। डुंडा से सुबह 6:30  बजे  किसी को बिना बताए मैं और धीरू भाई चल दिए...........आज हमें डोडीताल पहुँचना था ......वैसे हमारा डोडीताल दो दिन में पहुंचने का कार्यक्रम था मगर सेममुखेम भी जाना था वापसी में.......सो सब कुछ जल्दी जल्दी  करना था......नैथानी जी ने कल ही आने से मना कर दिया था .....सो सुबह किसी को तंग किये बिना ही चल दिये। डुंडा से डोडीताल जाने के लिए पहले उत्तरकाशी जाना पड़ता है........डुंडा से उत्तरकाशी की दूरी है 16 किमी.। उत्तरकाशी से ठीक पहले एक 400 मीटर लम्बी सुरंग है....वरुणावत पर्वत के ठीक नीचे............. आधे घण्टे में उत्तरकाशी पहुंच गए 7 बजे........... अब हमें गंगोरी  जाना था........गंगोरी उत्तरकाशी...

हरियाली काँठा यात्रा

***05 नवम्बर 2018*** 💐धन तेरस के दिन💐               प्रसिद्ध सिद्धपीठ माँ हरियाली देवी की हरियाली कांठा यात्रा अपने आप में एक अनोखी व अदभुत यात्रा है। हमें भी इस बार माँ हरियाली का बुलावा आया तो हम भी पहुँच गये धनतेरस की शाम 5:30 बजे उत्तराखण्ड राज्य के जसोली (रुद्रप्रयाग जिला) स्थित हरियाली देवी मंदिर में ..........      हमारी योजना यह पैदल यात्रा करने की कैसे बनी, जरा इस बारे में भी बता दूं। दरअसल हुआ यूँ था कि हम लोग जब इसी साल 31 मई को बैनीताल जा रहे थे तो उससे पहले हम हरियाली देवी मन्दिर में गए थे। और मन्दिर के पुजारी चमोली जी से हरियाली कांठा वाली यात्रा करने का वादा कर गए। चमोली जी से हमने इस यात्रा की थोड़ा बहुत जानकारी भी जुटा ली थी। उस दिन (31मई 2018) को मैं,धीरू भाई व मोहन भण्डारी जी बड़े ही शुभ अवसर पर यहाँ पहुंचे थे, जब मन्दिर परिसर में 100 फ़ीट ऊँचे  लोहे के खम्बे  को मशीन के द्वारा खड़ा किया जा रहा था, खम्बे के ऊपरी सिरे पर एक झण्डा लगाया गया था।       यह माता का आशीर्वाद ही था जो हमें भी इस खम्भे क...